मंगलवार, 5 जुलाई 2011

रक्तरंजित हादसों का यहीं तो मंसूर है

रक्तरंजित हादसों का यहीं तो मंसूर है
पिछले दिनांे अम्बिकापुर के गांधी चौक स्थित एसपी बंगले का अहाता गिरने से 13 लोगों की दर्दनाक मौत हो गई, इस हादसे के बाद आनन-फानन में जांच हेतु टीम तो गठित कर दिये गये हैं, लेकिन क्या वास्तव में इस मामले में किसी को सजा मिलेगी या फिर इसे मात्र एक प्राकृतिक आपदा बता इससे पल्ला छुड़ा लिया जायेगा, जिस तरह से आज तक सरगुजा में अपराधियों को बक्सने की परंपरा चलती आयी है, उसे देखते हुये तो यही लगता है कि इस मामले को भी दोषी आधिकारियों व जांचकर्ताओं के द्वारा आपस में बैठ कर सुलझा लिया जाएगा और केवल मुआवजा की घोषणा के बाद इस मामले से जिला प्रशासन पल्ला छुड़ा लेगा।
लेकिन इस हादसे के बाद कई परिवार के पास रोटी और आगे जीवन निर्वाह की समस्या उत्पन्न हो गई है, उसे देखते हुए क्या जांचकर्ता अधिकारी व सरकार इन परिवारों की भलाई के लिये व उनके संरक्षण के लिये ताकि वे सही तरिके से जीवनयापन कर सके कोई प्रयास करेगी...................यह तो समय ही बताएगा.................लेकिन वक्त के इस क्रूर निर्णय के आगे बेबस परिवारों चिख-चित्कार को देखकर एक मानव के हृद्य में शायद यही भाव उठ रहे होंगे................
कैसे मंजर यह सामने है देखो,
हंसते-हंसते लोग रोने लगे देखो,
चिखती है ये ईट्टे, बंगले दिवार की,
नींव में खामी कहीं भरपूर है।
बेखबर अधिकारियों से कहो,
जख्म बनता जा रहा नासूर है,
वक्त बड़ा निर्भय है, कठिन है, क्रूर है,
रक्तरंजित हादसों का यहीं तो मंसूर है।